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भारत समाचार

सजगता और सैन्य आत्मनिर्भरता होना जरूरी

जालंघर, 10 सितंबर। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ऎसा वास्तविक नियंत्रण रेखा के स्पष्ट निर्घारण नहीं होने की वजह से हो रहा है और दोनों देशों की सीमांए शांत है। लेकिन इस बयानों से हमारी सीमा निरापद नहीं होता। भारत के पूर्व में अरूणाचल प्रदेश के इलाके से लेकर लद्दाख के अक्साई जिन के इलाके तक चार हजार किलोमीटर से अघिक लंबी सीमा है। इसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) इसलिए कहते है, क्योकि दोनों देशो ने सीमा का आघिकारिक निर्घारण नहीं किया है।
1914 में भारत, चीन तत्कालीन तिब्बत की सरकार के साथ मैकमहन रेखा तय की गई थी। बाद में चीन ने इसे मानने से इनकार कर दिया था। इसलिए चीन आज भी कहता है कि मैकमेहोन रेखा को वह मान्यता नहीं देता है और चीन तिब्बत से लग उन सभी इलाकों को चीन का हिस्सा मानता है, जहां तिब्बती संस्कृति प्रचलित है। इस तर्क के आघार पर वह कहता है कि चूंकि अरूणालय के तवांग में तिब्बतियों का बडा मठ है, इसलिए तवांग सहित अरूणालय प्रदेश चीन का इलाका है। चूंकि भारत में ही कहा जाता रहा है कि मैकमहन रेखा एक मोटी निब से खींची गई है। इसलिए भारत की तरफ से भी यह स्वीकार किया जाता है कि सीमा रेखा स्पष्ट निर्घारित नहीं है। लेकिन इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि 1962 के युद्ध के बाद चीन ने इस मैकमहन रेखा के अनुरूप अपनी सेना वापस बुला ली थी और तब से जिस देश की सेना जहां तैनात थी, उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा कहा जाता है। चार हजार किलोमीटर लंबी इस रेखा के दोनों और भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने तैनात है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा जिस इलाके में है वहां घने जंगल है और यह रेखा ठंडे, बंजर और बर्फीले पर्वतों से होकर गुजरती है। इन इलाकों के चप्पे-चप्पे पर सैनिकों को तैनात करना मुमकिन नहीं है। यदि वास्तविक नियंत्रण रेखा का निर्घारण उसी तरह हुआ होता जैसा 1971 के युद्ध के बाद शिमला समझौते के तहत 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा का निर्घारण जम्मू-कश्मीर में किया गया था, तब तो नक्शा दिखाकर भारतीय सेना चीन की ओर से होने वाली किसी भी घुसपैठ को चुनौती दे सकती थी। फिलहाल जो वास्तविक नियंत्रण रेखा है। यह नक्शों पर नहीं दिखाई गई है, अर्थात यह साफ नहीं है कि यह रेखा किस पहाडी या किस नदी या किस गांव से होकर गुजरती है। इसलिए भारत और चीन के सैनिक अपनी-अपनी तैनाती की स्थिति को ही वास्तविक नियंत्रण रेखा मानकर इसकी निरंतर चौकसी करते रहते है। इसी के तहत दो पहाडियों की सीघ में जो क्षेत्र अपनी ओर पडता है उसे अपना इलाका बना दिया जाता है।

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