लखनऊ। हिंदुओं एवं मुसलमानों के धार्मिक नेताओं और बुद्धजीवियों ने मुस्लिम पक्ष के सबसे पुराने वादी हाशिम अंसारी द्वारा अयोध्या भूमि विवाद का अदालत के बाहर सुलह के लिए उठाए गए कदम का स्वागत किया है। धार्मिक नेताओं का कहना है कि आपसी सुलह से ही ऎसे संवेदनशील विषय का बेहतर हल हो सकता है।
अगर सभी पक्ष सर्वोच्चा न्यायालय गए तो एक और लंबी कानूनी ल़डाई शुरू हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि हाशिम अंसारी ने रविवार को महंत ज्ञानदास से करीब एक घंटे तक बातचीत कर उनसे मध्यस्थता का अनुरोध करते हुए दोनों पक्षों में आपसी सुलह से अयोध्या मसले का हल निकालने में सहयोग का अनुरोध किया था। ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना याकूब अब्बास ने सोमवार को कहा, ""अंसारी का कदम वास्तव में सराहनीय है। हमें यह समझना चाहिए कि मानवता से ऊपर कोई धर्म नहीं है। मेरे ख्याल में अंसारी द्वारा उठाया गया कदम मानवता के लिए है, न कि किसी धर्म के लिए।"" उन्होंने कहा, ""मुझे पूरा यकीन है कि अगर इस विवाद का निपटारा आपसी सुलह से हो जाता है तो इससे हिंदू-मुस्लिम एकता को और ज्यादा मजबूती मिलेगी।"" मौलाना की बात का समर्थन करते हुए अयोध्या स्थित रामलला (अस्थायी मंदिर) के प्रधान पुजारी महंत सत्येंद्र दास ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, ""मुझे यह सुनकर बहुत खुशी हुई कि हाशिम सौहार्दपूर्ण समझौते के लिए महंत ज्ञानदास से मिले। उन्होंने कहा कि मेरी राय में अब निर्मोही अख़ाडा को एक कदम आगे बढ़ना चाहिए।""
ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा, ""अयोध्या भूमि विवाद पहले ही राजनीतिक रंग ले चुका है। बहुत अच्छा होगा, अगर इस विवाद का हल आपसी बाचतीच से हो जाए। मैं हाशिम के कदम का स्वागत करती हूं और मेरा मानना है कि इस आपसी सुलह से इस मुद्दे का हल उन लोगों के मुंह पर जोरदार तमाचा होगा जो अपने निहित स्वार्थ के लिए इस मुद्दे को जिंदा रखना चाहते हैं।"" सुन्नी धर्मगुरू मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने हाशिम की पहल का स्वागत करते हुए कहा, ""अगर बातचीत के जरिए अयोध्या मसला हल हो जाए तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई ऎसा विवाद नहीं है, जिसका हल बातचीत न से न हो सके।"" अयोध्या स्थित सरयू मंदिर के पुजारी महंत जुगुल किशोर शास्त्री कहते हैं कि सर्वोच्चा न्यायालय जाकर फिर से एक नई कानूनी ल़डाई छे़डने की बजाय यदि सभी पक्ष आपस में बैठकर समझौता कर लें तो यह देश और समाज के हित में होगा। गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्चा न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या में विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा हिंदू महासभा को, एक तिहाई निर्मोही अख़ाडे को और बाकी एक तिहाई भाग सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को देने का फैसला सुनाया था। अदालत ने तीन महीने का वक्त दिया है, ताकि असंतुष्ट पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सके। फैसले के बाद सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सर्वोच्चा न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का एलान किया था।











