इस्लामाबाद/नई दिल्ली। अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय से भले ही देश के दोनों समुदायों ने राहत महसूस की हो, लेकिन यह बात पाकिस्तान के राजनीतिक और धार्मिक नेताओं को नहीं पच पाई है।
पाकिस्तान में कई राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने इसकी निंदा की है और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। भारत में फैसले के बाद हिंदू और मुस्लिम संगठनों और नेताओं की ओर से काफी सतर्कतापूर्ण बयान आए हैं जबकि पाकिस्तान के कुछ नेताओं और संगठनों ने इसे मुसलमानों के खिलाफ साजिश करार दिया है। पाकिस्तान के कई संगठनों ने फैसले का विरोध किया है और क्वेटा में कुछ धार्मिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए कहा है कि इस्लामी दुनिया में इसके नकारात्मक प्रभाव होंगे। सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल के प्रमुख फजल करीम ने कहा, बाबरी मस्जिद पर भारतीय अदालत के फैसले से दुनियाभर के मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं और भविष्य में इसके खतरनाक परिणाम निकल सकते हैं। उन्होंने कहा, जहां तक बाबरी मस्जिद का प्रश्न है, तो वह करीब 400 साल तक मुसलमानों की संपत्ति रही और हिंदुओं ने उसे शहीद कर दिया। अदालत को चाहिए था कि वह जमीन मुसलमानों को एक नई मस्जिद के निर्माण के लिए दे देती। लेकिन फजल भारतीय न्यायपालिका को यह नसीहत देने से पहले यह भूल गए कि भारत में भारत का कानून और न्याय प्रणाली लागू होती है, पाकिस्तान की नहीं।
पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के केंद्रीय मंत्री हामिद सईद काजमी ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की निंदा और कहा कि अदालत ने भारतीय मुसलमानों के साथ न्याय नहीं किया है और इस फैसले से निराशा हुई है। उन्होंने कहा, भारत अपने आपको एक लोकतांत्रिक देश कहता है, लेकिन वह लोकतंत्र के सिद्धांतों पर अमल नहीं करता है। आश्चर्य की बात यह है कि भारत कीलोकतांत्रिक प्रणाली पर अंगुली उठाने वाले हामिद सईद जैसे नेताओं ने कभी पाकिस्तान में लोकतंत्र देखा ही नहीं, वह भारत को लोकतंत्र का सबक सिखा रहे हैं। एक अन्य धार्मिक नेता मुफ्ती नईम ने इस फैसले को मुसलमानों के खिलाफ साजिश कर दिया और कहा, बाबरी मस्जिद का फैसला मुसलमानों की भावनाओँ को आहत करता है। हम इसका विरोध करते हैं और भारतीय मुसलमानों के साथ हैं। पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज) के नेता सिद्दीकुल फारूक ने कहा कि यह हिंदुओं को खुश करने वाला फैसला है।
उन्होंने कहा, 1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया तब भारत की छवि पर बहुत नकारात्मक प्रभाव प़डा था और अब भी दुनिया के सबसे ब़डे लोकतंत्र की छवि खराब हुई है। उनका कहना था कि अगर मस्जिद और मंदिर साथ बनेंगे तो इससे भी तनाव बढ़ेगा। अब भारतीय सुप्रीम कोर्ट को न्याय के सिद्धातों को सामने रखते हुए फैसला लेना चाहिए।
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अयोध्या फैसला: भारत को शकुन, पाक को तकलीफ











