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सरकार पर ब्याज दरों में और कटौती का दबाव

इसका साफ मतलब हुआ कि आने वाले दिनों में कर्ज को महंगा किया जा सकता है। गौरतलब है कि ग्लोबल मंदी को देखते हुए सितंबर 2008 के बाद से रिजर्व बैंक ने कर्ज को सस्ता करने के लिए नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर), रेपो रेट सहित अन्य वैघानिक दरों को घटाया है। अब चूंकि मुद्रास्फीति की दर एक बार फिर बढने लगी है, इसलिए माना जा रहा है कि ब्याज दरों को लेकर केद्रीय बैंक अपने रूख में बदलाव कर सकता है। इससे उद्योग जगत में बैचेनी है।




















