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भारत समाचार

वादा रहा: नही निभा पाई वादा

निर्माता: समीर कर्णिक, सुनील ए. लुल्ला
निर्देशक: समीर कर्णिक
संगीत: मोंटी शर्मा, तोशी साबरी, शरीब साबरी, बब्बू मन, गौरव दासगुप्ता, राहुल सेठ सेडी, संजय चौघरी कलाकार: बॉबी देओल, कंगना, द्विज यादव, मोहनीश बहल, शरत सक्सेना
समीक्षा: इस हफ्ते रिलीज हुई निर्देशक समीर कार्णिक की फिल्म "वादा रहा" दो मरीजों की कहानी है। जिसमें से एक
वयस्क है और दूसरा बच्चा।
इन दोनों केजरिये आशा और निराशा को पेश किया गया है। विचार अच्छा है, लेकिन लेखन ऎसा नही है जो गले उतर जाएं। इससे फिल्म ठीक से प्रभाव नही छोड पाती है। फिल्म में बॉबी देओल एक प्रसिद्ध डॉक्टर की भूमिका में है। फिल्म में बॉबी देओल का नाम ड्यूक चावला है। वह कैंसर जैसी बीमारी पर रिसर्च कर रहा है। उसके हंसमुख स्वभाव के कारण जूनियर्स और मरीज उसे काफी पसंद करते है। जटिल से जटिल ऑपरेशन ड्यूक सरलता से कर देता है। उसके साथी जब इस बारे में पूछते है, तो वह कहता है कि आशा और उम्मीद के कारण वह कठिन काम भी कर जाता है। वह आशावादी होने के फायदे अक्सर अपने दोस्तों को गिनाता है। ड्यूक की जिंदगी में सब कुछ बेहतर चल रहा है। नलिनी (कंगना) को वह बेहद चाहता है। फिलहाल दोनों करियर पर घ्यान दे रहे है, लेकिन भविष्य को लेकर उनके कुछ सपने है। अमेरिकी संस्थानों ने कैंसर पर ड्यूक के रिसर्च को मान्यता दे दी है। अचानक सब कुछ बदल जाता है। एक दुर्घटना घटती है, और ड्यूक को लकवा मार जाता है। ड्यूक की जिंदगी अस्पताल के कमरे तक सिमट जाती है क्योंकि वह चलने-फिरने के काबिल नही है।
नलिनी भी उसका साथ छोड देती है। ये हादसे ड्यूक को चिडचिडा बना देते है, और वह कुंठित हो जाता है। उसे लगता है कि ऎसी जिंदगी से मर जाना बेहतर है। आशावादी ड्यूक निराशावादी हो जाता है। एक दिन रोशन (द्विज यादव) नामक किशोर ड्यूक की जिंदगी में आता है। वह थोडा शैतान है लेकिन बहुत ही प्यारा लडका है। पूरे अस्पताल में सभी उसे चाहते है। ड्यूक पहले तो उससे चिढता है, लेकिन घीरे-घीरे दोनों दोस्त बन जाते है। रोशन की बहन को कैंसर है, और वह मौत से लड रही है। ड्यूक के कमरे की खिडकी के पास बैठकर रोशन उसे बाहरी दुनिया के हाल सुनाता है। उसका वर्णन सुनकर ड्यूक को बेहद खुशी मिलती है। रोशन उन लोगों के बारे में बताता है जो कई कठिनाइयों के बावजूद अंत में विजयी हुए है और जिंदगी के प्रति आशावादी है।
इन लोगों के बारे में सुनकर ड्यूक में भी आशा का संचार होता है। वह रोशन की बहन को बचाने की सोचता है और अपना रिसर्च फिर शुरू करता है। रोशन उसका लगातार उत्साह बढाता है। ड्यूक के हाथ और पैर ठीक होने लगते है। एक दिन डॉक्टर्स की सहायता से वह चलता भी है। ड्यूक उस खिडकी के बाहर देखना चाहता है, जहां से रोशन ने बाहर की दुनिया का हाल सुनाया और उसके जीवन में फिर आशा का संचार हुआ। जैसे ही ड्यूक खिडकी से परदा हटाता है उसे बाहर एक दीवार दिखाई देती है। ड्यूक जब इस बारे में पूछता है तो उसे पता चलता है कि दीवार वहां पर तीन साल से है।
रोशन की बहन के बारे में ड्यूक डॉक्टर्स से पूछता है तो उसे जवाब मिलता है कि उसकी बहन नही बल्कि खुद रोशन कैंसर से पीडित है। ड्यूक के जीवन का अंघकार दूर कर रोशन उसे रोशनी से भर देता है। वह चाहता है कि ड्यूक अपना रिसर्च पूरा करें और कई रोशन की जिंदगी को बचाए। वह ड्यूक को उसका आशावादी दृष्टिकोण लौटा देता है, जो जिंदगी के लिए बहुत जरूरी होता है। स्क्रीनप्ले फिल्म की कमजोर कडी है। कंगना का किरदार ठीक से पेश नही किया गया है। बॉबी के एक्सीडेंट होने के बाद कंगना उनकी जिंदगी से निकल जाती है। उनसे मिलने के वे खिलाफ रहती है। जब बॉबी ठीक होे जाते है तो कंगना वापस बॉबी की जिंदगी में चली आती है और वे उन्हें स्वीकार भी लेते है। बॉबी का ठीक होना फिल्मी लगता है।
द्विज यादव से जो संवाद बुलवाए गए है उन्हें सुन लगता है कि मानो कोई बच्चाा नही बल्कि उम्रदराज अनुभवी इंसान बोल रहा हो। संगीत भी इस फिल्म का निराशाजनक पहलू है। फिल्म की कहानी में दम नही है। अभिनय की बात की जाए तो पूरी फिल्म में बॉबी छाए रहे। कंगना का निर्देशक खास उपयोग नही कर पाए। द्विज और मोहनीश बहल का अभिनय तारीफ के काबिल है। कुल मिलाकर "वादा रहा" अच्छी फिल्म का वादा नही निभा पाई है।

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