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जलवायु मुद्दे पर अमीर देश मदद करे तो ही बढ़ेंगे आगे : प्रमं.

दुनिया के सभी नागरिकों को समान अवसर की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, विकासशील देशों की गरीबी को बनाए रखकर जलवायु परिवर्तन की समस्या को नहीं सुलझाया जा सकता। प्रधानमंत्री का कहना था कि उन्होंने 2007 में ही घोषणा कर दी थी कि भारत प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन को ऎसे स्तर पर रखेगा कि यह विकसित देशों के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन से कम रहे। उन्होंने अपने बयान में कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक जिम्मेदार सदस्य की तरह भारत ने घोषणा की है कि वह वर्ष 2020 तक वर्ष 2005 की तुलना में अपना कार्बन उत्सर्जन 20 से 25 फीसदी तक कम कर देगा। उन्होंने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए भारत के व्यापक कार्यक्रम का जिक्र किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोपेनहेगन सम्मेलन मानवता की साझा आकांक्षाओं का परिचायक है और इससे जलवायु परिवर्तन से ल़डने के लिए वैश्विक प्रयासों का मौका मिल रहा है। भारत की चिंता इससे पहले विदेश मंत्रालय की ओर से भी प्रधानमंत्री की कोपेनहेगन यात्रा पर एक बयान जारी किया गया। इसमें कोपेनहेगन में कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते की जगह एक राजनीतिक प्रतिबद्धता जाहिर करने वाले समझौते की संभावनाओं का जिक्र करते हुए भारत की ओर से चिंता जाहिर की गई।
विदेश सचिव निरूपमा राव की ओर से जारी इस बयान में कहा गया है कि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि नई राजनीतिक प्रतिबद्धता वाले समझौते से कहीं ऎसा न हो कि बाली एक्शन प्लान से ही ध्यान भटक जाए और विकसित और विकासशील देशों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे की जो सहमति बनी थी वह खत्म हो जाए।
उन्होंने कहा कि भारत ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर काम कर रहा है और वह अफ्रीकी देशों के मित्र देशों के संपर्क में भी है। उन्होंने साफ कहा कि भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोेपेनहेगन सम्मेलन के बाद जो भी चर्चा हो वह संयुक्त राष्ट्र सिद्धांतों और नियमों के अनुरूप हो और उसमें बाली एक्शन प्लान को भी ध्यान में रखा जाए।




















