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क्या इंजीनियर को सेक्स की बीमारी है!

नई दिल्ली। राइट दु इन्फॉमेंशन (आरटीआई) के तहत एमसीडी के एक इंजीनियर के बारे में पर्सनल जानकारी मांगना जब महंगा पडा तब दिल्ली हाईकोर्ट ने 75 हजार रूपए हर्जाना देने के लिए कहा।
कोर्ट ने कहा कि आरटीआई एक्ट इसलिए नहीं बना है कि इसका गलत इस्तेमाल कर किसी की पर्सनल जानकारी के बारे में सचना मांगी जाए। कोर्ट ने एनजीओं से कहा कि वह 75 हजार रूपए बर्तार हर्जाना चार हफ्ते में जमा करे। हर्जाने की राशि दृष्टिहीनों के लिए काम करने वाली संस्था को दी जाए। एनजीओ ने आरोप लगाया थाकि एमसीडी के इंजीनियरिंग विभाग ने राष्ट्रमंडल खेल के कई प्रोजेक्टों में घपला किया है।
उसके अनुसार कई इंजीनियरों ने सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल किया। यह शिकायत पहले एमसीडी के आला अधिकारियों से की गई थी। लेकिन इंजीनियरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद एनजीओ ने आरटीआई एक्ट के तहत एक इंजीरियर के बारे में जानकारी मांगी। इसी बीच एनजीओ ने हाईकोर्ट में भी अर्जी दाखिल कर दी और कथित घपले की जांच की मांग की।
उसने कोर्ट में कहा कि  एमसीडी के आला अधिकारियों को कई बार लेटर लिखे गए, लेकिन इंजीनियरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। कार्रवाई के बारे में जवाब मांगने पर भी कोई जानकारी नहीं दी गई। कोर्ट में एमसीडी की ओर से पेश वकील ने कहा कि एनजीओ ने एमसीडी से जो सूचना मांगी थी, उसमें एक इंजीनियर के बारे में पूछा गया था कि उसके बॉयोलॉजिकल पिता कौन है। ऎसे में कई और सवाल थे। इस तरह के सवालों का क्या जवाब दिया जाए।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से जब इस बारे में पूछा तो उसने कहा कि एमसीडी के इंजीनियर ने उसे ब्लैकमेल किया और उसके लिए असंवैधानिक भाषा क इस्तेमाल किया। इसी वजह से उसने आटीआई के तहत इस तरह के सवाल पूछे। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया।

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