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फांसी मामलों को अपना हित साधन न बनाए सरकार

जस्टिस हरजीत सिंह बेदी और जस्टिस जेएम पांचाल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला अति प्रासंगिक बन गया है, क्योंकि आज राष्ट्रपति के समक्ष 26 दया याचिकाएं लंबित पडी हुई हैं। इनमें से कुछ मामलों में अदालत को मृत्युदंड की सजा सुनाए एक दशक से भी ज्यादा समय बीत चुका है। इन 26 कैदियों में 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए हमले के दोषी मोहम्मद अफजल गुरू भी शामिल है।
खंडपीठ ने कहा, हम न्यायाधीश, उन कारणों से व्यापक रूप से अनजान रहते हैं, जो किसी कैदी के पक्ष में या उसके खिलाफ करने के लिए सरकार को अंततोगत्वा प्रेरित करते हैं। न्यायाधीशों ने कहा, मगर फैसला चाहे जो भी हो, उसे मामले के तथ्यों से संबंधित वैध सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। हम जोर देकर कहना चाहेंगे कि मनुष्य कोभी संपत्ति या गुलाम नहीं है और उन्हें किसी राजनीतिक या सरकारी नीति को साधने की प्रक्रिया में प्यादे की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।




















