बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के अधर में लटक जाने से तकरीबन 800 बाल श्रमिकों की पढ़ाई बाधित हो गई है। अब वे फिर से बाल श्रमिक बनने की कगार पर पहुंच गए हैं। 80 लाख रूपए के बजट के बावजूद ये बाल श्रमिक पांचवीं कक्षा की परीक्षा अब तक नहीं दे पाए हैं।
राज्य के 50 जिलों को राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत चयनित किया गया था। इस परियोजना के अन्र्तगत आठ से 14 वर्ष आयुवर्ग के बाल श्रमिकों को शिक्षित करने के लिए राष्ट्रीय बाल श्रमिक विद्यालय खोलने की जिम्मेदारी गैर सरकारी संंगठनों को सौंपी गई। इस जिम्मेदारी में इन बच्चों को पांचवीं पास कराकर छठीं कक्षा में दाखिला कराना शामिल था। बांदा जनपद में ऎसे 40 विद्यालय खोले गए और प्रत्येक विद्यालय में पचास बच्चों को शमिल किया गया। यहां इस योजना के तहत दो हजार बच्चों को चिन्हित कर पढ़ाई शुरू हुई। परंतु 800 सौ बच्चों को पांचवीं कक्षा की परिषदीय परीक्षा नहीं दिलायी गई। बांदा शहर के गायत्री नगर के बाल श्रम विद्यालय में 35, अलीगंज में 40, पो़डाबाग में 42, निम्नीपार में 40 और मर्दननाका में 35 बच्चे पांचवीं कक्षा की परीक्षा देने से वंचित रह गये। इसके लिए जिम्मेदार स्वयंसेवी संगठनों का कहना है कि जिलाधिकारी द्वारा अनुदेशक व अन्य कर्मचारियों का मानदेय न दिए जाने से ये हालात पैदा हुए हैं। वहीं जिलाधिकारी रंजन कुमार ने बताया कि बाल श्रम विद्यालयों में ग़डब़डी की शिकायतें प्राप्त हुई थीं और जांच के दौरान सही पाए जाने पर मानदेय रोका गया। "बचपन बचाओ आन्दोलन" से जु़डे सामाजिक कार्यकर्ता महेन्द्र सिंह गौतम का कहना है, ""जनपद में बाल श्रमिक विद्यालय संचालन हेतु 80 लाख रूपये का बजट उपलब्ध है। संगठनों और प्रशासन की आपसी खींचतान में लगभग 800 सौ बालश्रमिक फिर से स़डकों व होटलों पर मजदूरी करने को विवश हैं। जिलाधिकारी ने अब तक न तो आरोपी संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई की है और न ही इन बाल श्रमिकों की शिक्षा के प्रबंध कर सके हैं।""





















