मुंबई। बंबई उच्च न्यायालय ने कानूनी दस्तावेज की वैधता पर सुनवाई करते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में कोई भी मां वसीयतनामे से अपने एकमात्र पुत्र को अलग नहीं रख सकती। हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा कि बेटी के पक्ष में वसीयतनामे को साबित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह अस्वाभाविक है। साथ ही अदालत ने बेटे के पक्ष में एक और वसीयतनामे का वैध करार देने से इंकार किया। बेटा उस गवाह को पेश नहीं कर पाया, जिसने वसीयतनामों को सत्यापित किया था। मामले के दोनों याची पृथ्वीराज पटेल और मीना पटेल की मां का जुलाई 1990 में निधन हो गया। उनकी निधन के बाद दो वसीयतनामे मिले। पहला वसीयतनामा 24 मई 1989 का तैयार किया गया था, जब ब्रिटेन में रहने वाली मीना अपनी मां के पास आई थी। इसके अनुसार बेटी को पूरी संपति मिली। इसमें पृथ्वीराज को इस आधार पर अलग रखा गया कि उसने अपने पिता की संपत्तियों का कुप्रबंधन किया था। दूसरा वसीयतनामा पृथ्वीराज ने पेश किया। इसमें नौ मार्च 1990 की तारीख प़डी है। भाई-बहन ने एक दूसरे को चुनौती देते हुए वसीयतनामों को पेश किया। न्यायाधीश रोशन दलवी ने पिछले सप्ताह फैसला दिया कि पृथ्वीराज के वीसयतनामे को मंजूरी दी जाती, लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड किया कि बेटा दोनों में से किसी भी गवाह को पेश नहीं कर सका। इसलिए वसीयतनामे को साबित नहीं किया जा सका। दूसरी तरफ अटार्नी के दफ्तर में बना बेटी का वसीयतनामा भी संदिग्ध था। क्योंकि यह मानना असंभव है कि मां अपने एकमात्र बेटे और पौत्रों को संपति से अलग कर देगी।
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इकलौते पुत्र को अलग नहीं कर सकती मां





















