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दुनिया की मंदी को भारत-चीन देंगे कंधा

मनीला, 22 सितंबर। एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने कहा है कि दुनिया को आर्थिक मंदी से उबारने में भारत और चीन जैसे विकासशील देश कर्णधार बनेंगे। यह जानकारी मंगलवार को जारी बैंक के ताजा आकलन में कही गई है। मनीला स्थित बैंक ने कहा है कि अभी सुधार के लक्षण उतने भी मजबूत नहीं हैं कि ये सरकारें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को उबारने के लिए जारी राहत कार्यक्रमों को रोक दें। बैंक ने मार्च में आकलन किया ता कि एशियाई सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी 3.4 प्रतिशत की दर से बढेगा। ताजा आकलन में इसे बढाकर 3.9 प्रतिशत कर दिया गया है। बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री जोग व्हा ली का कहना है, दुनिया के बिगडते आर्थिक माहौल के बावजूद, विकासशील एशियाई देश इस मंदी से उबारने में अहम भूमिका निभाएंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों और उनके केंद्रीय बैंकों की तरफ से उठाए गए ठोस कदम, मंदी से पहले उनके वित्तीय तंत्र की बेहतर सेहत और निर्यात पर कम निर्भर अर्थव्यवस्थाओं का जल्द संभलना, ये कारण बनें हैं इस नए आकलन के पीछे। बैंक ने भारत के बारे में आकलन किया है कि 2009 में उसकी अर्थव्यवस्था 6.0 प्रतिशत की रफ्तार से बढेगी।
बैंक ने पहले यह आकलन 5.0 प्रतिशत किया था। बैंक ने अगले साल यह रफ्तार 7.0 प्रतिशत रहने की संभावना जताई है। एडीबी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर निर्यात और कृषि क्षेत्र में खराब प्रदर्शन की आशंका के बावजूद भारत के कुशल आर्थिक प्रबंधन ने उस पर वैश्विक आर्थिक मंदी का उतना ज्यादा प्रभाव नहीं दोने दिया है। एडीबी ने चीन के बारे में कहा है कि उसकी अर्थव्यवस्था इस साल 8.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढेगी। यह पहले के आकलन के मुकाबले 1.2 प्रतिशत ज्यादा है। बैंक का कहना है कि इसकी वजह यह है कि चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था में 585 अरब डॉलर के राहत पैकेज का समावेश किया है।
बैंक ने कहा कि इस बेहतर आर्थिक आकलन की झलक इन क्षेत्रों के शेयर बाजारों में भी नजर आने लगी है। आर्थिक मंदी की शुरूआत के दौरान अमरीकी अर्थशाçस्त्रयों ने भी कहा था कि अगर भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाएं इसी रफ्तार से बढती रही, तो मंदी से उबरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। लेकिन भारत और चीन से भी जब मंदी की खबर आने लगी तो चिंता के बादल और गहरे हो गए थे। एडीबी के आकलन के मुताबिक निर्यात पर निर्भर दक्षिण कोरिया, हांगकांग, सिंगापुर, ताइवान जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सुधार के आसार नहीं हैं, क्योंकि उनकी वस्तुओं की मांग फिलहाल कमजोर है।

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