कोई परिणाम नहीं मिला

No Result Found

भारत समाचार

बिहार चुनाव: अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए होने वाले मतदान में अब एक सप्ताह से भी कम का समय बचा हुआ है। ऎसे में सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

खास बात यह है कि सभी दल अल्पसंख्यकों का रिझाने में कोई कोर-कसर नहीं छो़ड रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने तो अपने संयुक्त घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों के लिए वादों का पिटारा ही खोल दिया है तो सत्तारूढ़ जनता दल (युनाइटेड) भी अल्पसंख्यकों के मतों पर ललचाई नजर रखे हुए हंै। यही कारण है कि जद (यु) ने कट्टर हिंदुत्व का चेहरा बने अपनी सहयोगी भाजपा के दो नेताओं, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय सचिव वरूण गांधी को चुनाव प्रचार में आने पर विराम लगा दिया। अल्पसंख्यक मतदाताओं को साथ जो़डने के मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं है क्योंकि गाहे बगाहे वह खुद को मुसलमानों को सबसे ब़डा रहनुमा बताने में नहीं चूकती। अल्पसंख्यकों के लिए केंद्र सरकार द्वारा आरंभ की गई योजनाओं को वह अपना ब़डा हथियार मानती रही है। यूं तो भाजपा मानती है कि उसे मुसलमानों का वोट मिलता ही नहीं है और संभवत: यही वजह है कि उसके मुस्लिम उम्मीदवार सबसे कम हैं। फिर भी मुसलमानों का वोट पाने के लिए उसने अपने अल्पसंख्यक पोस्टर ब्वॉय सैयद शाहनवाज हुसैन से अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में भारी संख्या में प्रचार प्रसार की योजना बनाई है। भाजपा नेताओं का मानना है कि जद (यु) का साथ होने की वजह से भी उसे अल्पसंख्यक वोटों का फायदा मिलेगा। टिकटों के बंटवारे से भी यह बात साबित होती है कि कोई भी दल मुसलमानों में रिझाने में पीछे नहीं है।

राजद ने अब तक घोषित प्रत्याशियों में से करीब 35 प्रतिशत टिकट अल्पसंख्यकों को थमाए हैं तो लोजपा ने 25 प्रतिशत अल्पसंख्यक प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं। इसी तरह कांग्रेस की ओर से करीब 30 प्रतिशत उम्मीदवार अल्पसंख्यक हैं तो जद (यु) ने भी 20 से 25 प्रतिशत टिकट अल्पसंख्यकों की झोली में डाले हैं। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि यह वोट की राजनीति ही है कि सभी दलों ने ब़डी संख्या में अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। वैसे वे यह भी कहते हैं कि अल्पसंख्यकों के वोट पर अब किसी एक राजनीतिक दल का कब्जा नहीं है और उनका वोट बंटना तय है। जानकार बताते हैं कि इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य के 243 विधानसभा क्षेत्रों में से 50 से ज्यादा ऎसे क्षेत्र हैं जहां अल्पसंख्यकों का मत काफी मायने रखता है। ऎसे में लगभग सभी दलों में अल्पसंख्यकों के मतों को अपनी ओर आकर्षित करने की हो़ड मची है। इधर, अगर विधानसभा क्षेत्रवार अल्पसंख्यकों के मतों की तुलना की जाए तो राज्य में करीब 50 विधानसभा क्षेत्रों में अल्पसंख्यक परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में नजर आते हैं। इन 50 विधानसभा क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों की आबादी 18 से 75 प्रतिशत के करीब है। कोचाधामन विधानसभा क्षेत्र में जहां 74 प्रतिशत से ज्यादा अल्पसंख्यक मतदाता हैं वहीं किशनगंज में 65 प्रतिशत, अमौर में 74 प्रतिशत, बायसी और बहादुरगंज में 69-69 प्रतिशत मतदाता हैं। इसके अलावा जोकीहाट में भी 65 प्रतिशत मतदाता अल्पसंख्यक बताए जाते हैं। सीवान, रघुनाथपुर, ब़डहरिया में 21 से 27 प्रतिशत तो भागलपुर में 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता निवास करते हैं। इसी तरह कांटी, बरौली, गोपालगंज, सीवान, रघुनाथपुर, नाथनगर, बिहारशरीफ, नरकटियागंज में 20 से 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता हैं। विभिन्न दलों की अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिशों के बीच यह चुनाव परिणाम के बाद ही तय होगा कि इसमें सफलता किसे मिली है।  

अन्य खबरें

ये भी पढ़ें

अन्य खबरें