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भारत समाचार

झूठा ही रह गया झूठा ही सही

निर्माता: रॉनी स्क्रूवाला
निर्देशक: अब्बास टायरवाला
संगीत: ए.आर.रहमान
कलाकार: जॉन अब्राहम, पाखी टायरवाला, रघुराम, मानसी स्कॉट, नंदना सेन

समीक्षा: अब्बास टायरवाला वैसे तो जाने तू या जाने ना जैसी हिट फिल्म से हाल ही में चर्चित हो चुके है, लेकिन इस बार उनकी फिल्म झूठा ही सही उन्हें एक बार फिर वैसी ही सफलता दिलाए, इसमें पूरा संदेह है। अब्बास अपनी पत्नी पाखी को सिल्वर स्क्रीन पर बतौर हीरोइन देखने का मोह नहीं छोड पाए और उन्होंने इस फिल्म में जॉन के अपोजिट अधेड उम्र की अपनी पत्नी को हीरोइन के तौर पर लांच कर दिया। उनकी पत्नी पाखी फिल्म का एक आम किरदार तो बन सकती है लेकिन हीरोइन बनाकर अब्बास ने स्वयं ही फिल्म का भविष्य बॉक्स-ऑफिस पर लिख दिया। यह फिल्म कि सबसे कमजोर कडी साबित हुई।

कहानी: लंदन में अपने दोस्त उमर (रघुराम) के साथ बुकशॉप चला रहे सिद्धार्थ (जॉन अब्राहम) वेस्टर्न कल्चर में ऎसा फिट हो चुका है कि खुद सिड कहलाना उसे ज्यादा पसंद है। सिड अपने सपनों में हर उस चीज को पाता है और करता है जो हकीकत में वह सोच भी नहीं सकता। सिड सुंदर लडकियों को देख कर हकलाने लगता है। उसमें रत्ती भर का भी आत्मविश्वास नहीं है। दूसरी तरफ मिषिका (पाखी) को उसके प्रेमी ने धोखा दे दिया है। ऎसे में लंदन की एक सुसाइड हेल्पलाइन के फोन सिड के फोन पर आने लगते है और सिड को भी इन फोन कॉल्स का समाधान करना अच्छा लगता है। सिड इन फोन कॉल में अपना नाम फिदातो बताता है। इन फोन कॉल्स पर आत्महत्या करने के लिए सोचने वाले सिड से जीने की वजह और मकसद पूछते है। एक दिन सिड के फोन पर मिषिका की कॉल आती है और इसके बाद सिड उसका दोस्त और फिलॉसफर बन जाता है। इन्हीं कॉल्स के बाद इन दोनों की दोस्ती बढने लगती है। सिड के दोस्त उमर को यह पसंद नहीं और ना ही सिड की बेस्ट फ्रेंड कुर्तिका (मानसी स्कॉट) को यह पसंद है, लेकिन सिड का कुर्तिका में कोई लगाव नहीं। सिड की मिषिका से जब मुलाकात होती है तो पहली ही मुलाकात में वह उसे चाहने लगता है, लेकिन सिड अच्छी तरह जानता है कि अगर उसने सच बोला तो मिषिका उसे छोड देगी।  

कुल मिलाकर अगर झूठ ना कहा जाए तो फिल्म झूठा ही सही जॉन के करियर की अगली सुपर-डुपर फ्लॉप फिल्म साबित होने वाली है। अब्बास की पत्नी पाखी इससे फिल्म में काफी साल पहले एक  और फिल्म में आ चुकी है। लेकिन ये फिल्म ना तो उनके करियर को स्क्रिप्ट राइटर के रूप में उठा पाएगी और ना ही उन्हें एक्ट्रेस के रूप में स्थापित कर पाएगी। हालांकि ऎक्टिंग के लिहाज से पाखी बुरी नहीं है।
सिद्धार्थ के रूप में हैडसम और स्मार्ट जॉन अब्राहम का चुनाव भी गलत है। दब्बू स्वभाव के किरदार को जॉन निभा नहीं पाते। वे विश्वसनीय नहीं लगते। ए.आर.रहमान और अब्बास टायरवाला की जोडी इस बार गीत-संगीत में जाने तू या जाने ना का जादू पैदा नहीं कर सकी है।

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