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भारत समाचार

लीवर प्रत्यारोपण ने दी शिशु को नई जिंदगी

नई दिल्ली। मुंबई के पांच माह के शिशु तविश के शरीर में जन्म से ही रक्तस्त्राव होता रहता था। उसमें रक्त में थक्का जमने के लिए महत्वपूर्ण "फैक्टर 7" की कमी थी। देश में इस बीमारी से पीç़डत तविश पहला ऎसा शिशु है जिसका सफल लीवर प्रत्यारोपण किया गया। तविश के अभिभावक समीर और बीजल को हमेशा उसकी चिंता रहती थी। तविश के जन्म से ही आए दिन त्वचा, मस्तिष्क और गुर्दो में रक्तस्त्राव होता था।

विशेषज्ञों ने पाया कि तविश के रक्त में "फैक्टर 7" की कमी है। "फैक्टर 7" लीवर में बनता है और रक्तस्त्राव रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। तविश में इस जानलेवा रक्तस्त्राव को रोकने के लिए उसे नियमित रूप से संश्लेषित "फैक्टर 7" के इंजेक्शन देने प़डते थे और इसमें हर महीने 50 से 80 हजार रूपये तक का खर्च आता था। कई चिकित्सकों के उसकी बीमारी को लाइलाज बताने के बाद उसके माता-पिता ने मेदांता चिकित्सालय में संपर्क किया। जहां चिकित्सकों ने जिगर प्रत्र्यारोपण कर उसकी जान बचाई। देश में इस तरह के मामले में पहले ऎसे कभी नहीं किया गया था। "मेदांता इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ट्रांसप्लानटेशन" मुख्य शल्य चिकित्सक डॉ. ए.एस. सोयन कहते हैं कि तविश की बीमारी का तात्कालिक इलाज केवल लीवर प्रत्यारोपण ही था। उसे केवल 150 ग्राम भार के जिगर की जरूरत थी। चिकित्सकों ने तविश की मां के लीवर का एक छोटा सा हिस्सा निकालकर उसमें प्रत्यारोपित कर दिया। डॉ. सोयन ने बताया कि यह मुश्किल काम था क्योंकि तविश को लगातार "फैक्टर 7" की आपूर्ति करना प़ड रही थी और ऎसे में यह भी ध्यान रखना था कि इसकी अधिक मात्रा उसकी छोटी-छोटी रक्त नलिकाओं में बह रहे खून को जमा सकती है। लीवर प्रत्यारोपण चिकित्सक डॉ. नीलम मोहन कहती हैं कि 500,000 में से केवल एक में ही इस तरह की समस्या देखी जाती है। अब तविश पूरी तरह स्वस्थ है और उसे उसके माता-पिता के साथ घर भेज दिया गया है।  

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