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भारत समाचार

होटल व्यवसायी ओबेराय ने की थी 50 रूपये की नौकरी

नई दिल्ली। बहुत कम लोगों को पता होगा कि विश्व में सर्वाधिक होटल एवं रिजोर्ट चलाने वाले प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने ओबेराय ग्रुप के संस्थापक चेयरमैन राय बहादुर मोहन सिंह ओबेराय ने अपना करियर महज 50 रूपये मासिक तनख्वाह से शुरू किया था। उन्होंने वर्ष 1922 में शिमला के सिसिल होटल में गेस्ट क्लर्क के रूप में काम शुरू किया था। उसी दौरान उन्हें पंडित मोतीलाल नेहरू ने सौ रूपये का इनाम दिया था। कालेज की पढ़ाई छो़डकर ओबेराय पाकिस्तान के भाऊन कस्बे से नंगे पांव रोजगार की तलाश में शिमला पहुंचे। वह होटल परिसर में 10 फुट 9 फुट आकार के कमरे में ठहरते थे। यह जानकारी हिमाचल पर्यटन विभाग द्वारा शिमला के अतीत के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए प्रकाशित टेबल बुक "हर घर कुछ कहता है" में दी गई है। यह पुस्तक पर्यटन विभाग के निदेशक डा. अरूण शर्मा के व्याक्तिगत प्रयासों से 10 माह की मेहनत के बाद हाल ही में प्रकाशित की गई है।
पुस्तक में बताया गया है कि मोहन सिंह ओबेराय सिसिल में मैनेजर, क्लर्क, स्टोर कीपर आदि सभी कार्यभार खुद ही संभाल लेते थे तथा अपने प्रयत्नों एवं क़डी मेहनत से उन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों का दिल जीत लिया था। पुस्तक के अनुसार जब ब्रिटिश मैनेजर इरनेस्ट क्लार्क छह महीने की छुट्टी पर लंदन गए तो वह सिसिल होटल का कार्यभार मोहन सिंह ओबराय को सौंप गए। मोहन सिंह ने इस दौरान होटल के औकुपैंसी को दोगुना कर दिया। इस दौरान मोहन सिंह ओबेराय तथा उनकी पत्नी ईसार देवी होटल के लिए मीट तथा सब्जियां खुद खरीदने जाते थे। उन्होंने इस बिल में 50 फीसदी की कमी ला दी। किताब के अनुसार मोहन सिंह ओबेराय ने अपने संस्मरण में लिखा है, ""मेरे सिसिल होटल में नौकरी ग्रहण करने के शीघ्र बाद ही होटल के प्रबंधन मे महत्वपूर्ण तब्दीली आई। मिस्टर ग्रोव से क्लार्क ने कार्यभार संभाला। पहली बार भाग्य ने साथ दिया तथा मेरे स्टेनोग्राफी के ज्ञान के कारण मुझे कैशियर तथा स्टेनोग्राफर दोनों का पदभार मिला।"" ओबेराय ने लिखा है, ""मुझे होटल के विस्तृत कार्यो की जानकारी मिलनी शुरू हुई। इस दौरान पं मोतीलाल नेहरू सिसिल होटल में आए। उन्होंने टाइप करने के लिए एक अति महत्वपूर्ण रिपोर्ट दी जिसे मैंने पूरी रात क़डी मेहनत के बाद पं नेहरू को सौंपा। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे इनाम के रूप में 100 रूपये का नोट दिया।"" ओबेराय ने कहा है, ""मैं एक भावुक व्यक्ति हूं जिसने छोटे से जीवन में दयावान लोगों को कम ही देखा है। पंडित जी के इस कृपादृष्टि से मैं भावुक हो उठा तथा मैं उनके कमरे से तत्काल बाहर आ गया। ये 100 रूपये मेरे लिए सौभाग्य लेकर आया था, क्योंकि इसके बाद मेरी तनख्वाह में बहुत ब़डा परिवर्तन हुआ। इस पैसे से मैंने पत्नी के लिए ƒ़ाडी, बच्चों के लिए कप़डे तथा अपने लिए एक रेनकोट खरीदा।"" किताब के अनुसार जब सिसिल होटल के मैनेजर क्लार्क ने महज 25,000 रूपये में उन्हें होटल बेचने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने राशि का प्रबंध करने के लिए कुछ वक्त मांगा। उन्होंने राशि जुटाने के लिए अपनी पैतृक संपत्ति तथा पत्नी के जेबरात तक गिरवी रख दिए थे तथा उन्होंने पांच साल की अवधि में सारी राशि होटल मालिक को लौटा दी थी।

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