वाशिंगटन, 17 सितंबर। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वे जीन थैरेपी का इस्तेमालकर कलर ब्लाइंडनेस का इलाज करने के करीब पहुंच गए हैं। इस तरह का प्रयोग बंदरों पर सफल हुआ है। इससे उम्मीद की जा रही है कि अब जीन थैरेपी से मनुष्यों में भी इस बीमारी का इलाज हो सकेगा। कलर ब्लाइंडनेस (रंगांधता) एक ऎसी बीमारी है जो जन्म से ही होती है। इस बीमारी से पीडित व्यक्ति लाल और हरे रंग में भेद नहीं कर पाता। एक अमरीकी टीम ने जन्म से ही रंगांधता से पीडित बंदरों का इलाज थैरेपी से शुरू किया। इसके बाद वे बंदर लाल और हरे रंग में भेद करने लगे। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं मे इलाज के दौरान जिस तकनीक का इस्तेमाल किया, उसका विवरण नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। अब तक यह माना जाता रहा है कि वयस्कों के मस्तिष्क में इस तरह का बदलाव करना संभव नहीं है, जिससे रंगांधता से पीडित व्यक्ति हर रंग की पहचान करना शुरू कर दे। बीमारी की पता चलने पर शिशुओं में विजुअल रिसेप्टर लगाकर इस बीमारी का इलाज होता आया है, लेकिन सबसे बडी दिक्कत यह है कि इस बीमारी का पता ज्यादातर मामलों में बडा होने पर ही चलता है। नए प्रयोग में बंदरों की आंखों के पीछे स्थित प्रकाश संवेदी कोशिकाओं में जीन डाले गए। इन जीनों में वह जरूरी डीएनए कोड था जो लाल और हरे रंगों का अंतर समझने में सक्षम बनाता है। दो वर्षो तक चले प्रयोग के बाद बंदरों में यह बीमारी खत्म हो गई।