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भारत समाचार

राष्ट्रमंडल खेल: देसी गल्र्स ने बढाया मान

नई दिल्ली। राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला खिलाडियों ने देश का मान बढाया है। ये लडकियां अंग्रेजीदां नहीं है देसी मिट्टी से आई है। इन लडकियों ने देश का नाम रोसन करने के लिए अपने सारे सुख त्याग दिए। चक्का फेंक में कृष्णा और शूटर अनीसा को उनके पतियों ने और गीता को कुश्ती के हुनर उनके पिता ने सिखाए है। रांची की रिकर्व स्वर्ण विजेता दीपिका कुमारी के पिता ऑटो चालक है और मां नर्स है।

कृष्णा पूनिया: डिस्कस थ्रो स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाली भारतीय महिला एथलीट कृष्णा पूनिया ने बताया कि उनके पति वीरेन्दर पूनिया उनके व्यक्तिगत कोच हैं। वीरेंन्दर राष्ट्रीय स्तर के भाला फेंक एथलीट रह चुके हैं। अपनी पत्नी की काबिलियत देखने के बाद उन्होंने उन्हें डिस्कस थ्रो के लिए प्रशिक्षित करने का फैसला किया।
कृष्णा ने कहा, मेरा बेटा सात साल का है। हम दोनों कभी उसके पास नहीं रहते। जब वह डेढ़ साल का था, तब से उसकी दादी उसकी देखभाल करती हैं। मैं अभ्यास के लिए हमेशा बाहर रहती हूं और मेरे इस काम में मेरे पति मदद करते हैं। हमने हमेशा सोचा है कि हमारा बच्चा अपने मां-बाप के बारे में न जाने क्या राय रखता है। यह सोचकर बुरा लगता है लेकिन आज मैं खुश हूं कि एक मां के रूप में मेरा सपना सच हो गया है। कृष्णा ने बताया कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद सबसे पहले उन्होंने अपने बेटे से बात की। वह सही मायने में समझ नहीं सका कि उसकी मां ने कितनी ब़डी सफलता हासिल की है लेकिन वह बहुत खुश हुआ। यह कहते-कहते कृष्णा की आंखे भर आईं।
कृष्णा ने कहा, एक सात साल का बच्चा भला यह कैसे समझ सकता है कि उसकी मां ने 52 साल के बाद देश को एथलेटिक्स में स्वर्ण दिलाया है। उसके लिए तो उसकी मां का पास रहना जरूरी है। हमें उसे समझाने में बहुत दिक्कत आती है लेकिन हर बार वह मान जाता है। मैं तो कभी-कभी अभ्यास के वक्त उसके बारे में सोचकर रो प़डती थी लेकिन एक खिल़ाडी होने के नाते खुद को समझा भी लेती थी। वर्ष 2006 के एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने वाली पूनिया सहित भारत की तीनों महिला एथलीटों ने डिस्कस थ्रो में इतिहास रचते हुए हुए तीनों पदकों पर कब्जा किया। हरवंत कौर ने इस स्पर्धा का रजत जीता जबकि सीमा अंतिल को कांस्य पदक मिला।
भारतीय खिलाडियों ने भारत को राष्ट्रमंडल खेलों की किसी एथलेटिक्स स्पर्धा में 52 साल बाद स्वर्ण पदक जिताया है। पूनिया ने जहां 61.51 मीटर के साथ पहला स्थान हासिल किया वहीं हरवंत ने 60.16 मीटर के साथ दूसरा स्थान हासिल किया। सीमा ने 58.46 मीटर दूरी के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया। वेल्स की फिलिप्स रोल्स 57.99 मीटर के साथ चौथे स्थान पर रहीं। ट्रैक एवं फील्ड स्पर्धाओं में इससे पहले कभी भी भारतीय खिलाç़डयों ने एक ही स्पर्धा के तीनों पदक नहीं जीते थे।  

अनीसा सईद: भारत की महिला निशानेबाज अनीसा सईद ने 25 मीटर एयर पिस्टल की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। अनीसा को भी भारतीय रेलवे में टीसी की नौकरी के दौरान प्रताडना झेलनी पडी। अनीसा को मुंबई में तैनात किया गया था। इस कारण अनीसा का निशानेबाजी का अभ्यास प्रभावित होता था।
अनीसा के पति मुबारक हुसैन के अनुसार, अनीसा ने मुंबई से फरीदाबाद या दिल्ली में तबादले के लिए कई बार अर्जी दी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। यहीं नहीं 15 माह से उसे वेतन तक नहीं दिया गया। इधर राष्ट्रमंडल खेल सिर पर थे, जिससे अभ्यास पर असर पडा रहा था। पैसा न होने से गोलियां आदि खरीदने में दिक्कत आ रही थी। ऎसे में उनकी कंपनी टयूलिप टेलीकाम के कर्नल बेदी ने आर्थिक तौर पर मदद की। इसलिए पिछले माह अनीसा ने रेलवे की नौकरी छोडने का निर्णय लिया और अपना इस्तीफा भेज दिया। हालांकि, इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ। मुबारक हुसैन ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण जीतने के बाद उन्हें रेलवे की ओर से सूचना मिली है कि अनीसा का तबादला फरीदाबाद कर दिया गया है।

गीता: पहली बार राष्ट्रमंडल खलों में शामिल महिला कुश्ती में गीता ने स्वर्ण पदक हासिल कर अपना और देश का नाम इतिहास में दर्ज करा दिया। भिवानी की रहने वाली गीता के सामने ऑस्ट्रेलियाई पहलवान टिक नहीं पाई। गीता ने 55 किलोग्राम भार वर्ग में ऑस्ट्रेलिया की एमिली बेनस्टैड को एकतरफा मुकाबले में 8-0 से पराजित कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।

दीपिका कुमारी: झारखण्ड की राजधानी रांची में एक ऑटो चालक की बेटी दीपिका कुमारी नहीं जानती थीं कि वह राष्ट्रमंडल खेलों में तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीत सकेंगी। दीपिका की मां गीता महतो ने बताया, उसे अपने उद्देश्य के बारे में शायद ही याद होगा, जब वह पत्थर मार कर आम गिरा देती थी। महतो को अपनी बेटी पर गर्व है।
महतो ने कहा, शुरू में हमें दीपिका को तीरंदाजी के उपकरण और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने में दिक्कत होती थी। हम अपने खर्च में कटौती कर उसकी जरूरतों को पूरा करते थे। लेकिन हमें उसकी दृढ़ता के बारे में पता था कि वह एक दिन जरूर अपने सपने को हासिल करेगी। दीपिका एक अच्छे घर में पैदा हुई, जो हमेशा उसकी मदद करने के लिए त्याग करता रहा है और कभी भी उसके विश्व तीरंदाज बनने के रास्ते में नहीं आया। शुरू में वह बांस से बने तीर और धनुष से अभ्यास करती थीं। दीपिका को पहला अवसर 2005 में उस समय मिला जब उनका दाखिला अर्जुन तीरंदाजी अकादमी में हुआ था। जिसे मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सरायकेला-खरसावा जिले में बनवाया है।
इसके बाद दीपिका ने कभी पीछे मु़डकर नहीं देखा। वह वर्ष 2006 में जमेशदपुर में स्थित टाटा तीरंदाजी अकादमी से जु़ड गई। जहां उन्हें सही उपकरण, प्रशिक्षण, एक पोशाक और एक कमरा मिला। लेकिन इसके लिए दीपिका को हर महीने 500 रूपये देने प़डते थे।  

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