भोपाल। मध्यप्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ दूसरी है। गरीबी यहां तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रूपए है।
सरकारी आंक़डे बताते हैं कि पिछले 10 वर्षो में वर्ष 1999-2000 के मुकाबले वर्ष 2008-09 में प्रतिव्यक्ति आय में प्रतिवर्ष 2534 रूपये का इजाफा हुआ है और यह आय 12384 से बढ़कर 14918 रूपये हो गई है। वहीं, दूसरी ओर आठ ऎसे जिले हैं, जहां प्रतिवर्ष आय का आंक़डा 10 हजार रूपये से भी कम है। प्रदेश में वर्ष 1999-2000 में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 12384 रूपये थी। उस समय राज्य के झाबुआ, ब़डवानी और डिंडौरी जिले की प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 8400 रूपये थी। वहीं, 10 साल बाद इस श्रेणी में और आठ जिले शामिल हो गए हैं। सरकारी आंक़डे बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, ब़डवानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय 10 हजार रूपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रूपये और प्रतिदिन 27 रूपये है। सरकार हालांकि, गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। प्रदेश के वित्त एवं सांख्यिकी मंत्री राघवजी का कहना है कि यदि प्रदेश के आठ जिले खतरे की श्रेणी में आए हैं तो ऎसा 10 वर्षो के आंक़डों में आए बदलाव के चलते हुआ होगा। वहीं, सांख्यिकी विभाग के आयुक्त एस.के. शर्मा का कहना है कि 10 साल पहले 8400 रूपये को प्रतिव्यक्ति वार्षिक आय आधार बनाया गया था, जबकि इस बार 10 हजार रूपये को आधार बनाकर आठ जिलों को इस श्रेणी में रखा गया है। शर्मा का कहना है कि जो जिले इस श्रेणी में आए हैं, उनकी आय का मुख्य आधार कृषि है। खासकर बुंदेलखंड में पिछले पांच साल में सूखा प़डा है, लिहाजा उस इलाके के जिले इसमें शामिल हैं। भोजन का अधिकार अभियान की रोली शिवहरे का कहना है कि प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच ल़डाई में गरीब पिस रहे हैं। एम.सी. सक्सेना की रिपोर्ट भी बताती है कि प्रदेश में गरीबी बढ़ रही है। इसकी मूल वजह गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार है।





















